असुर

हम राक्षस नहीं, आप की तरह ही इंसान हैं

हम असुर कौन हैं

हमलोग नेतरहाट (झारखंड), भारत के असुर आदिवासी समुदाय हैं। हम दुनिया के प्राचीन धातु विज्ञानी हैं जिन्होंने दुनिया को लोहा दिया। जिसकी मदद से मानव सभ्यता दुनिया के इस पड़ाव पर आज पहुंची है।

वी. बाल (1880) नेतरहाट (लातेहार, पलामू और गुमला) में असुरों के लोहे के काम से बहुत प्रभावित थे और उनकी मान्यता थी कि असुर लोग मुंडा परिवार से संबंधित हैं। सरत चंद्र रॉय (1915) के अनुसार असुर लोग नवपाषाण काल से मेगालिथिक काल के यात्री हैं जब मृतकों की स्मृति में बड़े-बड़े पत्थर के स्लैब खड़े किए गए और गढ़ आदि बनाए गए। इस इलाके में मिले औजार जो तांबा, कांसा और लौह युग के हैं तथा यहां पाई गई इंटें जो मोहनजोदाड़ो और अशोक काल (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) में इस्तेमाल की गई ईंटों के समान हैं, मेगालिथ काल में इनकी एक बड़ी आबादी के होने का संकेत देते हैं। वेरियर एल्विन (1942) का सुझाव है कि अगरिया और असुर दोनों उन्हीं असुरों के वंशज हैं जिनका प्रतिनिधित्व संस्कृत साहित्य के असुर करते हैं।

हमारा संगठन

हमारा संगठन ‘असुर आदिवासी विजडम अखड़ा’ एक गैर-निबंधित सामुदायिक संगठन है जिसकी स्थापना हमने मई 2019 में की है। जो नेतरहाट (झारखंड) के जोभीपाट गांव में स्थित है। हमारा यह संस्थान सामूहिक नेतृत्व में एक सामुदायिक परिषद द्वारा संचालित किया जाता है जिसमें नेतरहाट क्षेत्र के कई गांवों के वरिष्ठ, अगुआ और नौजवान पीढ़ी के लोग शामिल हैं।

हमारा इतिहास

यह कहा गया है कि असुरों ने अपनी सैन्य प्रतिष्ठा, औद्योगिक कौशल खो दिया और उनकी संतान को बड़ी संख्या में मार दिया गया। कहा जाता है कि आर्यों और असुरों के बीच यह संघर्ष सदियों से चला आ रहा है। असुरों में से जो नव-आर्य शरीर की राजनीति में लीन होने से इनकार करते थे, उन्हें शायद रक्षस या राक्षसों के साथ वर्गीकृत किया गया था।

हमारी ज्ञान संपदा

हम असुर, जो परंपरागत रूप से लौहविज्ञानी हैं, झारखंड के लातेहार, लोहरदगा, पलामू और गुमला जिलों सहित नेतरहाट पठार के पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं। एक समय था जब हम जंगलों, खनिजों और लोहा बनाने के कौशल के साथ जीते थे। लेकिन अब हम शिकार, अन्न-संग्रह और झूम खेती पर निर्भर हैं।

हमारे सहयोगी

फिलहाल हमारा एकमात्र सहयोगी ‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा’ संगठन है। जिसके सहयोग से हमलोग नेतरहाट के इलाके में वर्ष 2006 से सक्रिय हैं। लेकिन हमें तत्काल अनेक सहयोगियों की जरूरत है जो हमारे संगठन को वित्तीय और भौतिक समर्थन प्रदान कर सकें।

हमारा कार्यक्रम

हम जो करते हैं, हमें उस पर गर्व है। हमारे कार्यक्रम और गतिविधियां वाचिक आदिवासी ज्ञान और स्व-शासन को मजबूत करने के लिए डिज़ाइन की गई हैं।

सामुदायिक एकजुटता

दूसरे आदिवासी समुदायों की तरह ही हम भी दुनिया के पहले राष्ट्र हैं। हम सहअस्तित्व और समानता में विश्वास रखते हैं। परंतु हमारी सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था बाहरी दबावों से छिन्न-भिन्न हो चली है। इस संकट से उबरने के लिए संगठित और एकजुट होना हमारी पहली जरूरत है।

अधिकारों की रक्षा

हम असुर आदिवासी लोग विकास जनित सभ्यता के खनन, वन दोहन, जबरन विस्थापन और राज्य हिंसा के शिकार हैं। हमारे पारंपरिक स्वशासन के हक का हरण कर लिया गया है। इन सबसे हमारा और धरती का अस्तित्व संकट में है जिसकी रक्षा के लिए हम संकल्पबद्ध हैं।

ज्ञान परंपरा का संरक्षण

असुर भाषा दुनिया की उन भाषाओं में से एक है, जिनको यूनेस्को के खतरे में पड़ी भाषाओं के एटलस में शामिल किया गया है। बाहरी भाषा, संस्कृति, धर्म, शिक्षा और संचार माध्यमों के हमले से हमारी भाषा-संस्कृति तथा लोहा बनाने की ज्ञान परंपरा विलोपित होने को है। इसे सहेजना हमारी पहली प्राथमिकता है।

आदिवासियत का सशक्तिकरण

अब तक ज्ञात दुनिया के सभी जीवन दर्शनों में आदिवासियत का मूल्य सबसे प्रासंगिक और एक जीवित परंपरा है, जो पिछले छह हजार सालों से भी अधिक समय से प्रचलन में है। सामुदायिकता, सामूहिकता, सहभागिता, सहजीविता और सहअस्तित्व वाले आदिवासियत की रक्षा और इसका प्रचार-प्रसार हमारा लक्ष्य है।

शांति का साझाकरण

जैसे प्राकृतिक विविधता हमारे ग्रह के अस्तित्व हेतु जरूरी है, वैसे ही सांस्कृतिक और भाषायी विविधता इंसानी समाज के बचे रहने की पहली शर्त है। संस्कृतियों के टकराव ने हमेशा से दुनिया को युद्ध में धकेला है। हम आदिवासियों का मानना है कि विश्व शांति को बहाल करने में इंसानी विविधता बड़ी भूमिका अदा कर सकती है।

बेहतर भविष्य का निर्माण

हमारा भविष्य उस पारंपरिक ज्ञान, पुरखा परंपराओं और स्व-शासन व्यवस्था में निहित है जिसके सहारे हम सब प्रकृति के सान्निध्य में प्रेमपूर्वक रहते आ रहे हैं। जहां व्यक्तिवाद और लाभ-हानि आधारित पूंजीवादी अर्थव्यवस्था नहीं है। इस ज्ञान को नई पीढ़ी में रोप कर ही हम एक बेहतर दुनिया की रचना कर सकते हैं।

हमें आपके मदद और समर्थन की जरूरत है

असुर आदिवासी विजडम अखड़ा को आप सभी के तत्काल सहयोग की आवश्यकता है। वाचिक असुर भाषा-संस्कृति के दस्तावेजीकरण, समुदाय की जागरूकता, अधिकार अभियान, ज्ञान के साझाकरण और विभिन्न शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए हम असुर लोग आपकी मदद का इंतजार कर रहे हैं।

जरूरत का सामान दें

जरूरी नहीं कि आप हमें पैसा ही दें। आप हमारे असुर ज्ञान केंद्र को हमारी जरूरत का सामान दे कर भी मदद कर सकते हैं। जैसे, स्कैनर, फोटो एवं वीडियो कैमरा, लैपटॉप, स्टोरेज हार्ड डिस्क, आलमीरा, एक मोपेड, ऑडियो मिक्सर, रिकॉर्डिंग लेपल व स्टूडियो माइक, साउंड सिस्टम, डीजल पॉवर जेनरेटर, सोलर पॉवर सिस्टम, तिरपाल, दरियां, कंबल, चादरें, स्लेट व चाक, लकड़ी के खिलौने आदि। इसके लिए आप अपनी इच्छा का इजहार asurnation@gmail.com मेल द्वारा या +91-9262975571 फोन से कर सकते हैं।

आर्थिक सहयोग करें

इन सब चीजों और केंद्र द्वारा की जाने वाली अनेक गतिविधियों के लिए आप पैसे से भी हमारी मदद कर सकते हैं। आर्थिक मदद की कोई सीमा नहीं है। 10 रुपये से लेकर आप जितना चाहें दे सकते हैं। मदद की रकम आप हमें अपनी सुविधानुसार किस्तों में भी दे सकते हैं। इस DONATION लिंक के द्वारा आपकी मदद हम तक तुरंत पहुंच जाएगी। सहयोग देने के लिए तथा इस संबंध में अगर आपका कोई सवाल है, कोई सुझाव है तो आप हमसे कभी भी बेझिझक संपर्क कर सकते हैं। हमेशा और हर वक्त आपका स्वागत रहेगा। आपको सुनकर हमें प्रसन्नता होगी।

हम असुरों की छवियां

हमारी छवियां काली हैं, तांबई हैं और जामुनी भी हैं। हमारी सांसों में जंगल की धौंकनी है और छाती में लोहा भरा है। हमारे जीवन मूल्यों में सूरज की अथाह गरमी और रोशनी है जिससे पूरी दुनिया जगमग करती रहती है।

असुर स्त्री और बच्चा

जोभीपाट, नेतरहाट (झारखंड)

जोभीपाट, नेतरहाट (झारखंड)

लौह भट्ठी का निर्माण

जोभीपाट, नेतरहाट (झारखंड)

जोभीपाट, नेतरहाट (झारखंड)

लौह भट्ठी की पूजा

सखुआपानी, नेतरहाट (झारखंड)

सखुआपानी, नेतरहाट (झारखंड)

असुर सरहुल

जोभीपाट, नेतरहाट (झारखंड)

जोभीपाट, नेतरहाट (झारखंड) - 17 मई 2019

असुर ‘सरना’ धार्मिक स्थल

जोभीपाट, नेतरहाट (झारखंड)

जोभीपाट, नेतरहाट (झारखंड)

असुर विजडम अखड़ा की स्थापना

जोभीपाट, नेतरहाट (झारखंड)

जोभीपाट, नेतरहाट (झारखंड).

हमारे संगी-सहयोगी

हम किनके-किनके साथ जुड़े हुए हैं।

असुर समुदाय के पास दुनिया का सबसे प्राचीन ज्ञान और अत्यंत समृद्ध भाषा व संस्कृति है। लेकिन आज वे अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे हैं। उनका पूरा नैसर्गिक इलाका बॉक्साइट खनन के लिए बिड़ला कंपनी की जागीर बनी हुई है। उन्हें हम सबके मदद की तत्काल जरूरत है।

वंदना टेटे महासचिव, झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा

आर्य आव्रजन और वैदिक साहित्य के उद्भव के बाद से आदिवासियों को बहुत गलत समझा गया, और झारखंड के असुर अब अपनी भाषा और अस्तित्व के संकट का सामना कर रहे हैं। स्वतंत्रता पूर्व भारत के 1872 की पहली जनगणना में असुर लोग 18 आदिवासी समुदायों के साथ शीर्ष पर मौजूद थे।

प्रियंका कोटामराजू ‘असुरों के गीत’, द हिंदू बिजनेसलाइन (2014)

निश्चित रूप से, जहां लोहा एक छोटे-से आदिवासी समुदाय के खून में है, तो उसे प्रोत्साहित करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। लगता है कि जब जंगल उनके आधिकारिक नियंत्रण से छीन गए, तो असुरों ने इसे छोड़ दिया। यदि उन्हें मजबूती दी जाए, तो निःसंदेह वे फिर से अपने प्राचीन शिल्प को प्राप्त कर सकते हैं।

वेरियर एल्विन ‘द असुर’ (1963) की भूमिका में

संवाद बनाए रखिए

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जोभीपाट (नेतरहाट)
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